स्वयं प्रकट होती हैं माता, एक फीट तक बढ़ जाती है मूर्ती...छैगांवदेवी मंदिर का 700 साल पुराना इतिहास, 5 देवियों का यहां वास!
खंडवा जिले की पहचान सिर्फ इतिहास से नहीं, बल्कि आस्था और चमत्कारों से भी जुड़ी है. यहां ऐसे कई मंदिर हैं, जिनकी मान्यताएं पीढ़ियों से चली आ रही हैं. इन्हीं में से एक बेहद रहस्यमयी और चमत्कारी मंदिर खंडवा जिले के छैगांवदेवी गांव में स्थित है. इस मंदिर से जुड़ी मान्यताएं ऐसी हैं, जिन्हें सुनकर अच्छे-अच्छे लोग हैरान रह जाते हैं.
रेणुका चौदस पर खुद प्रकट होती हैं माता!
ग्रामीणों की मान्यता है कि रेणुका चौदस के पावन दिन माता रानी स्वयं प्रकट होती हैं. इस दिन मंदिर में स्थापित माता की प्रतिमाएं लगभग एक फीट तक ऊंची हो जाती हैं. यही कारण है कि हर साल इस खास दिन पर हजारों श्रद्धालु दूर-दूर से माता के दर्शन के लिए यहां पहुंचते हैं. कई भक्तों का कहना है कि उन्होंने यह बदलाव अपनी आंखों से देखा है.
700 साल पुराना मंदिर और पांच देवियों का वास
बताया जाता है कि यह मंदिर करीब 700 वर्ष पुराना है. यहां मां रेणुका के साथ मां बिजासनी, मां हिंगलाज, मां शीतला और खोखली मां की प्रतिमाएं विराजमान हैं. सालों से यह स्थान लोगों की आस्था का बड़ा केंद्र बना हुआ है. गांव वाले मानते हैं कि यहां सच्चे मन से मां को पुकारने वाला कभी खाली हाथ नहीं लौटता.
खुद प्रकट होता है चमत्कारी कुमकुम
मंदिर को लेकर एक और अनोखी मान्यता है. कहा जाता है कि शुभ अवसरों पर माता की प्रतिमा से स्वयं कुमकुम प्रकट होता है. यह कुमकुम प्रतिमा के सामने से निकलता है और जिसे भी लगाया जाता है, उसकी मनोकामना पूरी होती है. इसी वजह से भक्त इसे चमत्कारी मानते हैं और बड़े विश्वास के साथ अपने माथे पर लगाते हैं.
बीमारियों में भी असरदार है माता का जल
मंदिर के पुजारी आनंद जी तारे, जो पिछले 30 वर्षों से यहां सेवा कर रहे हैं, बताते हैं कि माता की प्रतिमा को स्नान कराने के बाद बचा हुआ जल भी चमत्कारी माना जाता है. मान्यता है कि इस जल से आंखों की कमजोरी, कान से कम सुनाई देना, त्वचा रोग और खासतौर पर मस्सों की समस्या में लाभ मिलता है.
पांच मंगलवार का उपवास और पूरी होती मन्नत
मान्यता के अनुसार जो भक्त माता के जल से उपचार कराता है, उसे पांच मंगलवार का उपवास भी रखना होता है. कई लोगों ने यहां ठीक होने की बात खुद बताई है. यही वजह है कि मंदिर में पूरे साल श्रद्धालुओं की भीड़ लगी रहती है.
मां ने बसाया था गांव, तभी पड़ा नाम छैगांवदेवी
ग्रामीणों के अनुसार प्राचीन समय में यह क्षेत्र खांडव वन के नाम से जाना जाता था और पूरी तरह वीरान था. कहा जाता है कि मां रेणुका ने यहां तपस्या की और राहगीरों को सपने में दर्शन देकर इसी स्थान पर गांव बसाने का आदेश दिया. तभी से इस गांव का नाम पड़ा छैगांवदेवी.
आज भी जीवित है सदियों पुरानी आस्था
आज भी यह मंदिर खंडवा जिले की धार्मिक धरोहर के रूप में अपनी पहचान बनाए हुए है. यहां सिर्फ मंदिर नहीं, बल्कि विश्वास, परंपरा और चमत्कारों की जीवित कहानी बसती है. मां रेणुका का यह धाम आज भी श्रद्धालुओं के लिए भक्ति और विश्वास का बड़ा केंद्र बना हुआ है.

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