3 साल तक बिना रुके चलती रही बप्पा की कलम! जानें वेदव्यासजी की 'चतुर शर्त' की कहानी जिसके आगे गणेशजी रह गए हैरान
हम अक्सर महाभारत को वेद व्यासजी की उत्कृष्ट कृति मानते हैं, लेकिन इस महाकाव्य में प्रथम पूज्य गणेशजी की भूमिका को कम याद किया जाता है. महान ऋषि व्यासजी ने महाभारत की कथा सुनाई थी और गणेशजी ने लिखकर इसे महाकाव्य बना दिया, जिसने पूरी सृष्टि को नया ज्ञान दिया. लेकिन गणेशजी के महाभारत लिखने के पीछे एक अनोखी शर्त भी थी. शर्त यह थी कि गणेशजी एक बार शुरू करने के बाद लिखना बंद नहीं करेंगे और व्यासजी को भी बिना रुके कथा सुनाती रहनी होगी. इस शर्त को सुनकर व्यासजी असमंजस में पड़ गए कि आखिर ऐसे कैसे होगा. आखिर इसे बिना सोचे-विचारे और समझे कैसे लिखा जा सकता है. तब व्यासजी ने इसे संतुलित करने के लिए, अपनी एक चतुर शर्त भी जोड़ दी कि गणेशजी को हर श्लोक को लिखने से पहले पूरी तरह से समझना होगा.
गणेशजी की अटूट कलम
पौराणिक कथाओं के अनुसार, वेद व्यासजी को विशाल महाकाव्य को सटीकता और गति के साथ लिखने के लिए किसी ऐसे व्यक्ति की आवश्यकता थी, जो अपनी बुद्धि, ज्ञान और समझ से छोटी-छोटी बातों को जान सके और अच्छे से लिख सके. इसके लिए केवल गणेशजी, बुद्धि और विद्या के देवता, को उपयुक्त माना गया. व्यासजी की बातों से गणेशजी सहमत हो गए, लेकिन उन्होंने एक शर्त रखी थी कि वह बिना किसी रुकावट के कथा बोलेंगे. इस तरह की शर्त ने व्यासजी के लिए कार्य को लगभग असंभव बना दिया, क्योंकि एक पल की भी चूक का मतलब होगा कि गणेशजी रुक जाएंगे.
व्यास की चतुर रणनीति
व्यासजी भी कोई साधारण ऋषि नहीं थे. वे जानते थे कि महाभारत की विशालता के लिए ना केवल दिव्य सहायता बल्कि उनकी अपनी बुद्धि की भी आवश्यकता थी. फिर गणेशजी की शर्त का मुकाबला करने के लिए, उन्होंने भी एक शर्त रख दी कि गणेशजी तब तक एक भी शब्द नहीं लिखेंगे, जब तक वे उसका अर्थ पूरी तरह से नहीं समझ लेते. यह व्यासजी की तरफ से एक मास्टरस्ट्रोक था. जब भी व्यासजी को सोचने के लिए समय चाहिए होता था, तब वह एक जटिल श्लोक रचते थे जो कई अर्थों से भरे होते थे. गणेशजी उन श्लोक का अर्थ समझते और फिर लिखते. इस प्रकार गणेशजी का लिखने का कार्य भी नहीं रुका और व्याजसी को महाभारत की गहराई और पूर्ण अर्थ बनाए रखने के लिए आवश्यक समय मिल जाता. बताया जाता है कि महाभारत की रचना लिखने में पूरे तीन साल लग गए थे.

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