मध्य प्रदेश की 4 लोककलाओं को GI टैग, पारंपरिक कला को वैश्विक मंच
भोपाल: मध्य प्रदेश की समृद्ध सांस्कृतिक और पारंपरिक हस्तशिल्प कला को अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक नई और बड़ी पहचान मिलने जा रही है। राज्य की चार अद्वितीय पारंपरिक कलाओं को प्रतिष्ठित ज्योग्राफिकल इंडिकेशन (GI) टैग प्रदान किया गया है। केंद्रीय वाणिज्य मंत्रालय के अंतर्गत आने वाले संगठन द्वारा यह मान्यता दी गई है। इस सूची में भोपाल के प्रसिद्ध जरी-जरदोजी बटुए, खजुराहो के मेटल क्राफ्ट, धार की मालवा पेंटिंग और राजगढ़ की सारंगपुर हैंडलूम साड़ी को शामिल किया गया है, जिससे अब इन उत्पादों की विदेशों में पायरेसी रुकेगी और स्थानीय कारीगरों को बेहतर दाम मिल सकेंगे।
नए पंजीकृत उत्पादों की अनूठी विशेषताएं
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भोपाल बटुआ जरीक्राफ्ट: भोपाल की बेगमों के शासनकाल में शुरू हुई यह कला बेहद बारीकी और नक्काशीदार हस्तशिल्प के लिए जानी जाती है। इसके तहत बटुए, बैग और पर्स पर रंग-बिरंगे धागों व मोतियों से शानदार कलाकृतियां उकेरी जाती हैं।
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खजुराहो मेटल क्राफ्ट: बुंदेलखंड क्षेत्र की इस प्राचीन हस्तशिल्प कला के अंतर्गत स्थानीय कारीगर पीतल, तांबे और कांसे जैसी धातुओं पर बेहद जटिल नक्काशी करते हैं। इसमें मुख्य रूप से पारंपरिक बर्तन, घंटियां, कलश और देवी-देवताओं की सुंदर मूर्तियां बनाई जाती हैं।
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मालवा पेंटिंग (धार): धार जिले और उसके आसपास के क्षेत्रों में विकसित हुई यह चित्रकला शैली बेहद खास है। इसमें रामायण, भागवत पुराण और रसिकप्रिया जैसी प्राचीन व धार्मिक किताबों के प्रसंगों को बेहद जीवंत चित्रों के माध्यम से कागजों और कपड़ों पर उतारा जाता है।
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सारंगपुर हैंडलूम साड़ी: राजगढ़ जिले के सारंगपुर में तैयार होने वाली ये साड़ियां और फैब्रिक्स अपनी उच्च गुणवत्ता के लिए प्रसिद्ध हैं। इन्हें सूती (कॉटन) और सिल्क के धागों को मिलाकर पारंपरिक करघों पर बेहद खूबसूरती से बुना जाता है।
मध्य प्रदेश के इन प्रसिद्ध उत्पादों को पहले ही मिल चुका है जीआई टैग
राज्य के कई उत्पाद पहले से ही इस गौरवशाली सूची में अपनी जगह बना चुके हैं। इनमें वस्त्रों में चंदेरी और महेश्वरी साड़ियां, धार का बाग प्रिंट और वारासिवनी की हैंडलूम साड़ी शामिल हैं। कला और शिल्प के क्षेत्र में इंदौर के चमड़े के खिलौने, दतिया और टीकमगढ़ के बेल मेटल वेयर, उज्जैन का बाटिक प्रिंट, जबलपुर का संगमरमर शिल्प, डिंडोरी की गोंड पेंटिंग व लोह शिल्प, और ग्वालियर के ज्यामितीय पैटर्न वाले कालीन प्रसिद्ध हैं।
कृषि और खाद्य उत्पादों की बात करें तो बालाघाट का चिन्नौर चावल, रीवा का सुंदरजा आम, सीहोर-विदिशा का शरबती गेहूं, झाबुआ का कड़कनाथ मुर्गा, रतलाम की सेव, मुरैना की गजक, बुंदेलखंड का कठिया गेहूं, जावरा का लहसुन, पन्ना का हीरा और पांढुर्णा का नागपुरी संतरा भी इस सूची का हिस्सा हैं।
क्या होता है जीआई टैग और इसका महत्व?
ज्योग्राफिकल इंडिकेशन (GI) टैग किसी भी क्षेत्र के विशेष उत्पाद, कृषि उपज या पारंपरिक कला को मिलने वाला एक कानूनी अधिकार है, जो उसे राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर एक विशिष्ट पहचान देता है। भारत में इसे 'ज्योग्राफिकल इंडिकेशन ऑफ गुड्स (रजिस्ट्रेशन एंड प्रोटेक्शन) एक्ट 1999' के तहत जारी किया जाता है।
एक बार किसी उत्पाद को यह टैग मिलने के बाद, कोई भी दूसरा व्यक्ति या देश उस नाम का गलत इस्तेमाल करके नकली सामान नहीं बेच सकता। इससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में उत्पाद की साख बढ़ती है, निर्यात (Export) के अवसर पैदा होते हैं और सीधे तौर पर स्थानीय कारीगरों व किसानों की आर्थिक स्थिति मजबूत होती है।

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