भोपाल: मध्य प्रदेश के उच्च और तकनीकी शिक्षा क्षेत्र से एक बेहद ही राहत भरी और बड़ी खबर सामने आ रही है। प्रदेश के निजी इंजीनियरिंग संस्थानों में दाखिला लेने वाले छात्रों की जेब पर अब फीस का बोझ काफी कम होने वाला है। मध्य प्रदेश के कई निजी इंजीनियरिंग कॉलेजों ने छात्रों को आकर्षित करने और तकनीकी शिक्षा को किफायती बनाने के लिए एक बड़ा और ऐतिहासिक कदम उठाया है।

इन संस्थानों ने राज्य सरकार की 'शुल्क विनियामक समिति' यानी फिक्स फिक्सिंग कमेटी (Fee Regulatory Committee - FRC) के समक्ष अपने न्यूनतम वार्षिक शिक्षण शुल्क में भारी कटौती करने का एक आधिकारिक प्रस्ताव पेश किया है। निजी कॉलेजों की मांग है कि उनके संस्थानों में बीई (BE) और बीटेक (B.Tech) पाठ्यक्रमों के लिए सालाना शिक्षण शुल्क को घटाकर मात्र ₹35,000 कर दिया जाए। यदि विनियामक समिति इस क्रांतिकारी प्रस्ताव को अपनी हरी झंडी दे देती है, तो इसका सीधा असर प्रदेश के पूरे तकनीकी शिक्षा तंत्र, दाखिला प्रक्रिया और मध्यमवर्गीय परिवारों के बजट पर पड़ेगा।

अस्तित्व की लड़ाई: छात्रों के गंभीर टोटे से जूझ रहे हैं निजी संस्थान, घाटे की भरपाई के लिए उठाया यह कदम

भोपाल: निजी इंजीनियरिंग कॉलेजों द्वारा फीस में इतनी बड़ी कटौती करने की पेशकश के पीछे कोई परोपकार नहीं, बल्कि पिछले कई सालों से लगातार बढ़ रहा एक गंभीर संकट है:

  • खाली रह जाती हैं आधी से ज्यादा सीटें: औद्योगिक जगत की बदलती मांग और प्लेसमेंट के घटते स्तर के कारण पिछले कुछ वर्षों में निजी इंजीनियरिंग कॉलेजों की लोकप्रियता में भारी गिरावट आई है। स्थिति यह है कि इन कॉलेजों में कुल स्वीकृत सीटों की तुलना में औसतन केवल 45 से 55 प्रतिशत सीटों पर ही छात्र प्रवेश ले रहे हैं, जबकि 50 प्रतिशत के करीब सीटें हर साल पूरी तरह खाली रह जाती हैं।

  • शिक्षकों के वेतन और मेंटेनेंस का संकट: सीटें खाली रहने के कारण कॉलेजों की आर्थिक स्थिति पूरी तरह से डगमगा गई है। उन्हें अपने कैंपस का रखरखाव करने, अत्याधुनिक प्रयोगशालाओं को संचालित करने और प्रोफेसरों को समय पर वेतन देने में भारी वित्तीय घाटे का सामना करना पड़ रहा है। इसी आर्थिक मंदी से उबरने के लिए अब वे कम फीस पर ज्यादा छात्रों को आकर्षित करने की रणनीति अपना रहे हैं।

बीते 10 वर्षों का भयावह रिपोर्ट कार्ड: मध्य प्रदेश में बंद हो चुके हैं 58 इंजीनियरिंग कॉलेज, सरकारी संस्थानों का बढ़ा क्रेज

भोपाल: मध्य प्रदेश में तकनीकी शिक्षा के ग्राफ और निजी कॉलेजों के गिरते स्तर को समझने के लिए पिछले एक दशक के आंकड़े बेहद चौंकाने वाले और चिंताजनक हैं:

  • बंद हुए 58 कॉलेज: छात्रों की भारी कमी, खराब इंफ्रास्ट्रक्चर और प्लेसमेंट न होने के कारण पिछले 10 सालों के भीतर प्रदेश के 58 निजी इंजीनियरिंग कॉलेजों पर हमेशा के लिए ताले लग चुके हैं। इन संस्थानों के बंद होने से अरबों रुपये का बुनियादी ढांचा बर्बाद हो गया।

  • सरकारी कॉलेजों की बंपर डिमांड: निजी संस्थानों की इस दुर्दशा के विपरीत, मध्य प्रदेश के सरकारी और स्वायत्त (ऑटोनॉमस) इंजीनियरिंग कॉलेजों का जलवा आज भी बरकरार है। सरकारी कॉलेजों में विश्वस्तरीय सुविधाएं और कम फीस होने के कारण हर साल 80 से 90 प्रतिशत से अधिक सीटें आसानी से भर जाती हैं।

  • 10 साल में खुला सिर्फ एक सरकारी कॉलेज: हैरानी की बात यह भी है कि जहां एक तरफ निजी कॉलेज धड़ाधड़ बंद हो रहे हैं, वहीं पिछले पूरे दशक में राज्य सरकार की ओर से प्रदेश में केवल एक ही नया सरकारी इंजीनियरिंग कॉलेज खोला जा सका है। ऐसे में निजी कॉलेजों की फीस कम होने से उन छात्रों को बड़ा सहारा मिलेगा जो सरकारी में सीट न मिलने के कारण मोटी फीस वाले निजी कॉलेजों में नहीं पढ़ पाते थे।

मध्यमवर्गीय परिवारों और ग्रामीण छात्रों के लिए खुलेगा राह; विनियामक समिति के फैसले पर टिकीं सबकी नजरें

भोपाल: इंजीनियरिंग कॉलेजों के इस नए प्रस्ताव ने तकनीकी शिक्षा के क्षेत्र में एक नई बहस को जन्म दे दिया है। शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ₹35,000 सालाना फीस का यह नियम लागू होता है, तो इससे ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के प्रतिभावान छात्रों को बहुत फायदा होगा:

  • कम होगी ड्रॉपआउट दर: भारी-भरकम फीस न दे पाने के कारण जो छात्र बीच में ही पढ़ाई छोड़ देते थे या इंजीनियरिंग का सपना छोड़ देते थे, वे अब आसानी से इस डिग्री को पूरा कर सकेंगे।

  • कमेटी की मंजूरी का इंतजार: अब हर किसी की नजरें शुल्क विनियामक समिति (FRC) के आगामी फैसले पर टिकी हुई हैं। समिति इस बात का बारीक मूल्यांकन कर रही है कि इतनी कम फीस में क्या कॉलेज शिक्षा की गुणवत्ता और एआईसीटीई (AICTE) के मानकों को बनाए रख पाएंगे या नहीं। माना जा रहा है कि नए शिक्षण सत्र की काउंसलिंग शुरू होने से पहले इस पर अंतिम निर्णय आ सकता है।